अथ श्री मणि कथा - sharmaplus

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अथ श्री मणि कथा


                             अथ श्री मणि कथा 

ath shree mani katha




             अथ श्री मणि कथा 

आज की हमारी पोस्ट है ! अथ श्री मणि कथा  इस पोस्ट को को लिखने के लिए हमारे बहुत से दोस्त है जो की हमें यह कहा की अथ श्री मणि कथा  के बारे में






पोस्ट जरुर करे और लेकिन इससे पहले मै वृहस्पति वार व्रत कथा और वृहस्पति देव की कहानी पहले से शेयर कर चूका हूँ ! और आगे हम अथ श्री मणि कथा  के बारे में पोस्ट कर रहे है जो नीचे दी हुई है 
                           

हमारे हिंदू धर्म के शास्त्रों में बहुत सी कहानीयां है ! और बहुत सी कथायें है ! इसको जब कोई पढता है या सुनता है ! उसे बड़ा ही आनंद आता है ! क्योकि ये कथाएं बहुत ही अच्छी लगने वाली है ! और इसमे ज्ञान का भंडार भी है और अपने देवताओ की याद भी है तो इस कथा को तो जरूर ही पढ़ना चाहिए ! एक तरफ से तो ज्ञान भी मिलता है और दूसरी तरफ से भगवान की भक्ति भी होती है यह तो मनुष्य को सच्चे तन मन से ही करना चाहिए तब ही भगवान की क्रपा होगी !

हमारे हिंदू धर्म के शास्त्रों के अनुसार भाद्र शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथी को चौथ का चाँद देखना निषेध  है ! क्योकि ऐसा माना जाता है ! की चौथ का चाँद देखने से झूठा कलंक लग जाता है ! और यदि कोई कारण वश से या फिर कोई अनजाने में भी चौथ का चाँद देख लेता है तो भी उसे झूठा कलंक लग जाता है ! तो इस दोष को शांत करने के या उसके कलंक को समाप्त करने के लिए अथ श्री मणि कथा सुननी चाहिए उससे ही उसका दोष दूर होगा ! वह कथा इस पोस्ट में है उसे पढकर कथा के बारे में जानकारी कर लेवे !

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                                               ''अथ श्री मणि कथा ''

एक समय की बात है ! की जब एक बार भगवान श्री कृष्ण जी अपने मित्र बाल - ग्वालो के साथ एक सभा कर रहे थे ! उस सभा को चलते ही थोड़ी ही देर में सत्तहा  जीत उस सभा के बीच आ पहुचे  वे मणि पहने हुए थे ! तब बाल - ग्वाल बोले की हमारी सभा के बीच आज तो सूर्य भगवान भी आ रहे है ! तब श्री कृष्ण जी बोले की ये सूर्य भगवान नहीं है ये तो चाचा सत्तहा  जीत है ! ये चाचा तो मणि पहन कर आये है !



इस बात पर ग्वालों ने कहा की यह मणि तो श्री  कृष्ण जी के नाना उग्र सेन महाराज को सोभा दे ! जो की मथूरा के राजा है ! ऐसी बात पर सत्तहा  जीत चुपचाप उस सभा से उठकर अपने घर चले गए ! और घर पहुँच कर यह बार अपने बड़े भाई प्रशन  को कहा की आज श्री कृष्ण जी मुझसे मणि मांग रहे थे ! तब उसके बड़े भाई प्रशन ने कहा की श्री कृष्ण जी आपसे मणि मांग रहे है ! तो आप मणि मुझे दे दे ! नहीं तो आपके पास श्री कृष्ण जी मांग लेंगे ! तो बड़े भाई प्रशन ने मणि पहन कर कहीं दूर जंगल में चला गया ! वहाँ कोई शेर प्रशन को मारकर उससे मणि छीन लिया ! आगे कोई जामवंत नाम का रीछ उस शेर को मारकर उस शेर से मणि छीन ली और मणि को ले जाकर अपनी बेटी जामवंती के पालने में टांग दिया !

उधर सत्तहा  जीत अपने भाई को गायब देखकर अपने घर वालो से कहां की श्री कृष्ण जी उससे मणि मांग रहे थे ! शायद श्री कृष्ण जी प्रशन को मारकर मणि ले लिया होगा ! यह बात घर से फैलती बाहर भी फ़ैल गयी और धीरे - धीरे श्री कृष्ण जी की पटरानीयों तक फ़ैल गयी ! तो राधा रानी और रुक्मणि ने श्री कृष्ण जी से कहा की आपने भाद्र शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथी को चौथ का चाँद देख लिया है ! जिससे आपको झूठा कलंक लग गया है ! इस पर श्री कृष्ण जी ने कहा की मै मणि को खोज कर झूठा कलंक को हटाऊंगा !

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ऐसा कहकर श्री कृष्ण जी मणि की खोज करने के लिए जंगल में चले गए ! वहाँ खोजते -खोजते वे देखा की मणि एक रीछ की गुफा में रीछ की लड़की जामवंती के पालने में थी ! श्री कृष्ण जी ने मणि लेना चाहा तो वह जामवंत नाम का रीछ उसके साथ विरोध करने लगा ! इस बात पर दोने में युद्ध छिड़ गया और एक माह तक दोनों में युद्ध होता रहा इस पर श्री कृष्ण जी ने कहा की मेरे सामने कोई एक दिन तक युद्ध नहीं कर सकता और रीछ ने भी कहा की मेरे सामने कोई एक दिन भी युद्ध नहीं कर सकता और रीछ ने कहा की आप कोन हो तब श्री कृष्ण जी ने अपना चतुर्भुज रूप दिखाया !

श्री कृष्ण जी का रूप देखकर रीछ ने श्री कृष्ण जी से  क्षमा याचना की तथा रामावतार वाली बात दोहराई की राम में जामवंत को अगले जन्म में मिलने का वादा किया था ! और जामवंत कहने लगा की मैंने अपने स्वामी के साथ युद्ध करके बड़ा पाप किया है ! इस लिए श्री कृष्ण जी के साथ अपनी पुत्री का विवाह कर दिया और देहज में उसे मणि दे दी !

श्री कृष्ण जी अपने घर आ गए और वह मणि सत्तहा  जीत को दे दी ! इस पर सत्तहा  जीत को अपनी गलती का अहसास हुआ ! की मैंने श्री कृष्ण जी को झूठा कलंक लगाया है ! तो सत्तहा  जीत ने अपनी पुत्री सत भामा का विवाह श्री कृष्ण जी से कर दिया और वह मणि श्री कृष्ण जी को देहज में दे दिया ! और जो इस कथा को पढता है ! और सुनता है और सुनाता है ! उसको भाद्र शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथी को चौथ का चाँद को देखने से कोई दोष नहीं लगता है ! इस लिए जिसने भी भाद्र शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथी को चौथ का चाँद को देखा है उसे अवश्य ही यह कथा करनी चाहिए !                                 समाप्त

इस कथा में बताया गया है की भाद्र शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथी को चौथ का चाँद के दर्शन से झूठा कलंक लग जाता है ! ऐसा इस कथा में भगवान श्री कृष्ण जी के साथ हुआ है और अंत में भगवान श्री कृष्ण जी ने मणि की खोज लगाकर सचाई दिखाई है ! सत्तहा  जीत जी ने श्री कृष्ण जी पर झूठा कलंक लगाया है ! फिर खुद को ही अपनी गलती माननी पड़ी और कथा में बताया प्रशन जी को सिंह ने मार डाला और सिंह को मारकर जामवंत नामक रीछ ने मणि ले ली ! और रीछ भी अपने स्वामी को पहचान नहीं पाया और युद्ध करता रहा और अंत में मणि श्री कृष्ण जी भगवान को दे दिया क्योकि रीछ का कुछ वादा भी था ! और इस पर भी पक्का था की उसको जीत कर ही मणि ले जा सकते है ! तो वह अक्कल से काम ले कर श्री कृष्ण जी का विवाह अपनी पुत्री से कर दिया और मणि भी ऐसे ही दे दिया की युद्ध में ना तो कोई की हार और ना ही कोई की जीत हुई श्री कृष्ण जी ने मणि सत्तहा  जीत को दे दिया ! आखिर सतरह जीत ने भी वह मणि श्री कृष्ण जी भगवान की ही दिया !

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