करवा चौथ व्रत की कथा - sharmaplus

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करवा चौथ व्रत की कथा

   

                                          करवा  चौथ व्रत  की कथा 

करवा  चौथ  यह कार्तिक में चौथ का व्रत आता है ! वही करवा  चौथ  का व्रत आता है ! अब करवा  चौथ  की कथा के बारे में जानेगें आज की यह पोस्ट करने से पहले मै नागपंचमी  की कथा और वृहस्पति वार व्रत कथा की पोस्ट को पहले ही शेयर कर चूका हूँ ! यह करवा  चौथ  का व्रत बहुत सी महिलाएँ जिसकी शादी हो चूकी है ! वे करती है ! 
              
SHARMAPLUS RAMESH KUMAR SHARMA





करवा  चौथ व्रत के पहले दिन रात के समय से अपने मुह में अच्छी तरह से कुला करके यानी की करवा  चौथ व्रत के पहले ही मुह से अन्न ना रहे ! फिर करवा  चौथ  व्रत के दिन सुबह जल्दी उठकर सूर्य उदय से पहले ही व्रत के लिए खाना का त्याग कर फिर रात को चंद्रमा को उगने का इंतजार करती है ! 

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जब चंद्रमा उगागा उसे देखकर ही भोजन करती है ! पुरे दिन निराहार रहकर यह व्रत करती है ! इसके पीछे यह मानना है ! की शादीशुदा महिलाये अपने पति व आप की लंबी उम्र की कामनाये करती है ! तथा कम - धंधे भी अच्छी तरह से चलते रहे ! और अपनी मनोकामनाए पूरी हो उसी के लिए यह  करवा  चौथ का व्रत   करती  है ! करवा  चौथ  व्रत की कथा है !
वो निचे लिखी हुई है ! वो पढ़े !

                                 करवा  चौथ व्रत  की कथा 


एक बार एक साहूकार के सात पुत्र  वह एक पुत्री थी !साहूकार के सात पुत्र  अपनी बहन को साथ लेकर भोजन करते थे !  कार्तिक के महीने को लगते ही  चौथ आ गई अथार्थ चौथ का व्रत आ गया ! भाई अपनी बहन से बोला आओ हम भोजन करते हैं !  तब उसकी बहन ने कहा कि आज तो मेरे करवा चौथ का व्रत है !  इसलिए मैं चांद के उगने पर ही भोजन करेंगी  भाई ने सोचा कि बहन तो  भूखी रहेगी इसलिए एक भाई ने  चालनी  लेकर टीबा के पीछे अथार्त रेत के पीछे दीपक जलाकर से चालनी से ढक दिया और अपनी बहन से बोला की बहन चांद उग गया है ! उसको अरग दे ले !  बहन को क्या पता कि चांद उग गया है !

तो उस बहन ने अपनी भाभियां से बोले कि चांद उग गया है ! चलो हम अर ग दे वे  भाभियां बोली कि आपका चांद उग गया है !  पर हमारा चांद तो रात को उगेगा ! बहन अकेले ही अर ग देकर अपने भाइयों के साथ भोजन करने के लिए बैठ गई ! बहन जब पहला भोजन  का टुकड़ा जब लेती है ! तो उसमें बाल आ गया !  फिर दूसरा टुकड़ा देती है उसमें सिवाल आ गया ! उसके बाद तीसरा टुकड़ा भोजन करने के लिए लेती है तब उसके ससुराल वाले उसे लेने आ गऐ !

 और वह बोले  कि इसका पावना  काफी बीमार है !इसलिए जल्दी भेजो ! इसे ससुराल भेजने के लिए उस लड़की की माँ ने  कपड़े पहनाने के लिए तीन बार बुगचचा  खोला तो  तीनों बार उसमें सफेद भातों निकले !  और उस लड़की की माँ ने  जल्दी की  सफेद पहना कर उसे ससुराल भेज दिया ! और उसकी माँ ने  एक सोने का सिक्का पल्ले बांध दिया !  और बोली  कि रास्ते में कोई भी मिले उसके चरण छूना जो कि आपको सुहाग के आशीष दें !  रास्ते में उसे सब आशीष देते गए और पर सुहाग आशीष कोई भी नहीं थी !

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तब वह ससुराल पहुंची और दरवाजे पर छोटी ननद खड़ी थी !  वह उसके पग  लगी तो और बोली  की सील,  सपूती हो,  सात पुत्रों  की मां हो !  पर मेरे भाई का दुख देख !  वह उसे सोने का टक्का  देखकर पल्ले  के गांठ बांधकर भीतर  गई !  उसकी सासु  ने उनके बैठने के लिए आसन भी नहीं डाला ! और उसकी  सासु बोले के ऊपर आपका धनी तो मरा हुआ है ! वह  उसके पास जाकर रोने लगी !  उसके बाद उसकी सासु दासी को बची - खुची रोटी देकर भेज देती है !  और कहती है कि मर्यो सेवड़ी को  रोटी दे दो !

उसके बाद कुछ दिनों के बाद में मंगसीर की चौथ आई !   उसको बोली की करवा ले लो जब वह बोली है चौथ माता उजड़ी  तो आप ही सुधरेगी !  मुझे तो सुहाग देना पड़ेगा !  तो चौथ माता बोली  कि पोह की  चौथ आएगी वह मेरे से  बड़ी  है !  वह आपको सुहाग देगी ! इस तरह से सारे महीने की चौथ आ गई सभी ही  ऐसा कहती गई !  क्योंकि मेरे से बड़ी चौथ आएगी वह तुम्हें सुहाग देगी !  फिर समय के साथ आस्योज की चौथ आई और उसको बोले कि कार्तिक की चौथ तुझसे नाराज है ! आप उसका पैर पकड़ लेना वह  आपको सुहाग देगी !  की फिर कार्तिक की चौथ आ गई !

वह बोली की भईयो  की प्यारी करवा ले - दिन में चांद उगाने वाली  करवा ले !  धनी - भुखानी  करवा ले व्रत को बिगड़ने वाली करवा ले ! तब साहूकार की वह बेटी  उसके पैर पकड़ ली और रोने लगी और कहने लगी !  कि हे चौथ माता मेरा सुहाग तो आपके हाथ में है ! और वह  आपको देना ही पड़ेगा !

और आगे चौथ माता बोली  की पापिनी - हत्यारी  तुम मेरे पैर पकड़ी ही बैठी हो !  साहूकार की वह  बेटी बोली मेरी बिगड़ी तो आप को सुधारने पड़ेगी ! और मुझे तो अपना सुहाग देना ही पड़ेगा !  फिर चौथ माता राजी हो गई !  और आंखों से काजल निकालकर नाखून से मेहंदी निकाल कर अपने तिलक से रोली  निकाली और  अपनी छोटी से  छोटी अंगुली से छांटा  दिया ! और उसके बाद उसका पति उठकर  बैठ गया ! और वह बोला कि काफी सो  लिया !  तब उसकी पत्नी बोली बारह महीने हो गए !  उसके बाद चौथ माता ने मुझे सुहाग दिया है ! वह बोला कि चौथ माता का उछाव  करेंगे ! जब वह चौथ माता की कथा सुनी करवा मिला चूरमा बनाया फिर दोनों भोजन करने लगे !

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भोजन करने के बाद वह दोनों चौपड़ - पासा खेलने लगे !  नीचे से सासु  उसके लिए रोटी भेजी ! दोनों को चौपड़ - पासा खेलते देख कर दासी आकर उसके सासु से बोली  कि वे दोनों चौपड़ - पासा खेल रहे हैं !  सासु  उपर आई !  उसे देखकर खुश हुई और पूछा कि यह सब कैसे हुआ !  वह बोली  की चौथ माता के व्रत से हुआ है !  सासू उसे गले लगा ली !  सासू भी सुहाग  के लिए बहुत आशीष दी ! और  सारी नगरी में कह  डालें कि स्त्री - पुरुष में सभी बच्चे चौथ माता का व्रत करें !

 तेरह चौथ करे ! हे चौथ माता जैसे आपने साहूकार की बेटी को सुहाग दिया है ! वह सब को देना जो कहता है सुनता है हुंकार भरता  है !  अपना सारा परिवार को दियो !


इसके बाद बिंदायक जी की कहानी कहे !  click hare 


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