नव रात्रा का छठवाँ दिन कात्यायनी - sharmaplus

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नव रात्रा का छठवाँ दिन कात्यायनी

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माता कात्यायनी का मंत्र -

चन्द्र   हासोज्जव   लकरा   शाई   लवर   वाहना ।

कात्यायनी   शुभं   दद्या   द्देवी दानव  घातिनी  ।।


या  देवी सर्व  भू‍तेषु माँ कात्यायनी  रूपेण संस्थिता ।

नमस्तस्यै   नमस्तस्यै   नमस्तस्यै   नमो  नम: ।।






नवरात्रा अनेक लोग करते हैं नवरात्र पर विशेष कर  दुर्गा माता की उपासना की जाती है ! दुर्गा माता के छठवे दिन या छठवे स्वरूप का नाम कात्यायनी है !  इसका कात्यायनी नाम होने की कोई पुरानी कथा है !  पहले के समय में कत नामक एक प्रसिद्ध महर्षि  था !उसका पुत्र जिसका नाम ऋषि कात्य था !  इस कात्य के गौत्र में  विश्व प्रसिद्ध महर्षि कात्यायन उत्पन्न हुए थे ! वे कात्यायन भगवती पराम्बाकी की उपासना करते थे !

काफी दिनों तक उन्हें कठोर तपस्या की थी !  उनकी इच्छा थी  की माता भगवती उनके घर में पुत्री  के रुप में जन्म लेवें ! और माता भगवती  भी उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली ! कुछ दिनों के बाद जब दानव  महिषासुर का अत्याचार पृथ्वी पर बहुत तेज बढ़ गया था तब भगवान ब्रहमा, विष्णु, महेश ,तीनो ने अपने - अपने तेज का अंश देकर महिषासुर के विनाश के लिए एक देवी को उत्पन्न किया !

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 महर्षि कात्यायन ने सर्वप्रथम इसकी पूजा की थी ! इसी कारण से यह कात्यायनी कहलाई  गई है ! ऐसी भी  कथा सुनने को मिलती है !  कि ये  महर्षि कात्यायन के वहां पुत्री  के रूप में उत्पन्न हुई थी !  आज आश्रीवन कृष्ण  चतु र्दशी   को जन्म लेकर शुक्ल सप्तमी, अष्टमी, तथा नवमी, तक तीन दिन उन्होंने कात्यायन ऋषि की पूजा ग्रहण कर दसमी  को महिषासुर का वध किया था !

माता कात्यायनी अमोघ फल  देने वाली है !  भगवान कृष्ण को पति के रूप में  पाने के लिए व्रज की गोपियों ने  इनकी पूजा कालिंदी - यमुना के तट पर किया करती थी !  यह व्रज  मंडल की अधिष्ठात्री देवी के रूप में प्रतिष्ठित है !  इसका स्वरूप अत्यंत ही भव्य  और दिव्य  है !  इनका वर्ण स्वर्ण  के समान चमकीला है !और भास्वर  है ! इस माता के चार भुजाएं है !  माता जी का दाहिनी ऊपर वाला हाथी अभय मुद्रा में है ! तथा नीचे वाला हाथ वर मुद्रा में है !  और माता की बाईं तरफ के ऊपर वाले हाथ में तलवार है !  और नीचे वाले हाथ में कमल पुष्प शोभाभित है !  इस माता का वाहन सिंह है !

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दुर्गा पूजा के छठे दिन किस माता के स्वरूप की उपासना की जाती है !  इस छठवें  दिन साधक का मन "आज्ञा" के चक्कर में स्थिति होता है ! योग साधना में इस "आज्ञा चक्र" का बहुत अधिक महत्व है !  इस चक्कर में स्थिति बन वाला साधक  माता कात्यायनी के चरणों में अपना सर्वस्व निवेदित कर देता है ! परिपूर्ण आत्म दान करने वाले ऐसे भक्तों  को सच्चे भाव से  माता कात्यायनी के दर्शन प्राप्त होते हैं !

माता कात्यायनी की तो कोई भक्ति करता है !  और उपासना करता है उसको अर्थ , धर्म , काम , मोक्ष , के चारों फल की प्राप्ति बड़ी आसानी से हो जाती है ! इस लोक  में स्थित रहकर भी अलोलिक तेज  और  प्रभाव से युक्त  हो जाता है ! उसके रोग - दोष , शोक , संताप , भय आदि सर्वथा विनष्ट हो जाते है !  मनुष्य के जन्म - जन्म के पापों को नष्ट करने के लिए माता की उपासना बहुत सरल और सुगम है !

अथार्त इनके  समान कोई दूसरा मार्ग नहीं है !  इस माता का उपासक निरंतर माता सान्निध्य  में रहकर परम पद का अधिकारी बन जाता है ! हमें  "सर्वतो भावेन"  माता के शरण में होकर  माता की पूजा उपासना के लिए सदैव तैयार रहना चाहिए !  यहि एकमात्र उपाय है !

नवरात्र के छठे दिन माता को शहद का भोग लगाया जाता है !

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माता कात्यायनी का ध्यान निम्न मंत्रो का उचारण करके किया जाता है - 


वन्दे  वांछित   मनोरथार्थ   चन्द्रा   र्घकृत   शेखराम् ।

सिंहरूढ़ा     चतुर्भुजा    कात्यायनी      यशस्वनीम् ॥


स्वर्णा  आज्ञा   चक्र  स्थितां  षष्टम  दुर्गा   त्रिनेत्राम् ।

वरा भीत  करां  षगपद धरां कात्यायन  सुतां  भजामि ॥


पटाम्बर  परि  धानां स्मेर मुखी नाना  लंकार भूषिताम् ।

मंजीर,   हार,   केयूर,   किंकिणि   रत्नकुण्डल   मण्डिताम् ॥


प्रसन्न  वदना पञ्वा  धरां कांत  कपोला  तुंग   कुचाम् ।

कमनीयां   लावण्यां   त्रिवली  विभूषित  निम्न  नाभिम ॥




माता कात्यायनी का पाठ स्तोत्र निम्न मंत्रो का उचारण करके किया जाता है - 


कंचनाभा वरा   भयं    पद्म   धरा       मुकटोज्जवलां ! 

स्मेर   मुखीं  शिव  पत्नी कात्यायने  सुते  नमोअस्तुते !!


पटाम्बर    परिधानां    नाना       लंकार     भूषितां !

सिंह  स्थितां पदम  हस्तां कात्यायन  सुते   नमोअस्तुते !!


परमां      वदमयी     देवि      परब्रह्म   परमात्मा !

परमशक्ति,    परमभक्ति,   कात्यायन   सुते   नमोअस्तुते !!



माता  कात्यायनी  का कवच का मंत्र का उचारण -



कात्यायनी   मुखं   पातु    कां    स्वाहा   स्वरूपिणी !

ललाटे     विजया    पातु    मालिनी  नित्य  सुन्दरी !!


कल्याणी     हृदयं   पातु    जया    भग    मालिनी !!





एक बात और भी ध्यान में रखने की है जब कोई भी नव रात्रा के दिनों में व्रत - उपवास करते है ! तो उसको जरूर ही दुर्गा सप्त शती का पाठ करना चाहिए ऐसा करने से बाधाये भी दूर होती है ! अपने घर में सुख - शांति भी बनी रहती है और मनुष्य की मनो कामना भी पूरी होती है ! इस लिए यह सब जानकर जरुर ही दुर्गा सप्त शती का पाठ अवश्य ही करना चाहिए !


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