नवरात्रा का दूसरा दिन ब्रह्मचारिणी - sharmaplus

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नवरात्रा का दूसरा दिन ब्रह्मचारिणी

नवरात्रा  का दूसरा दिन माता ब्रह्मचारिणी



NAV RATRA KA DUSRA DIN SHREE BRAHAMCHARINI





ब्रह्मचारिणी माता का  मंत्र -

या देवी सर्व भू‍तेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।


नमस्तस्यै  नमस्तस्यै  नमस्तस्यै   नमो   नम:।।



दधाना   कर  पद्माभ्याम   अक्ष  माला  कमण्डलू।


देवी    प्रसीदतु   मई    ब्रह्म   चारिण्यनुत्तमा।।



नवरात्रा के दूसरे दिन को ब्रह्मचारिणी के नाम से जाना जाता है ! माता के अलग-अलग स्वरुप है जिसमें दुर्गा माता के नव  शक्तियों का दूसरा स्वरूप ब्रह्मचारिणी का है ! दुर्गा माता के नव दूसरे नाम का अर्थ लिया जाता है ! कि ब्रह्म शब्द तपस्या है लगातार तप  करने वाली  कहा गया है !

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वेद स्तत्वं तपो ब्रम्हा - वेद, तत्व  और तप  ब्रम्हा शब्द का अर्थ है ! ब्रह्मचारिणी देवी माता का स्वरूप पूरी तरह ज्योर्तिमय और बहुत सुंदर है ! माता के दाहिने हाथ में जप करने के लिए माला है बाए हाथ में कमंडल रहता है !
माता के बारे में पूर्व जन्म में जब यह हिमालय के घर पुत्री के रूप में हुई थी यह माता भगवान शिव शंकर को अपना पति के रुप में प्राप्त करने के लिए इन्हें बहुत कठिन तपस्या की थी !

इसी कठोर तपस्या के कारण इन्हें तब तपश्चारिणी  या ब्रह्मचारिणी के नाम से जाना जाता है जब माता ब्रह्मचारिणी ने तपस्या की थी तब तो एक हजार  वर्ष तक इन्होने केवल अनमोल फल - मूल खाकर ही एक हजार वर्ष बिताया था ! माता ने सौ वर्षों तक तो शाक निर्वाह किया था ! कुछ दिनों तक कठोर तपस्या उपवास किए थे !

जिससे  कठिन दोपहर की धुप और  गर्मी और वर्षा के कष्ट सहे थे ! और इनके बाद माता ने तीन हजार  वर्षों तक जमीन पर टूट कर  गिरे हुए बेल - पत्तों को खाकर भगवान शिव शंकर की आराधना की थी ! उसके बाद में कई हजारों साल तक तो माता ने निर्जल  और निराहार ही रहकर भगवान शिव शंकर की तपस्या करती रही !

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माता ने पहले ही पर्ण  को खाना छोड़ देने से माता का नाम ''अपर्णा '' भी पड़ गया था !  माता ने कई हजारों वर्षों तक तपस्या करने के कारण माता ब्रह्मचारिणी देवी का पूर्व जन्म का शरीर एकदम क्षीण  हो गया ! वह अत्यंत ही कृश काय  हो गई ! और उनकी यह दशा को देखकर माता मैं ना बहुत ही दुखी हो उठी ! और कठिन तपस्या से विरत  करने के लिए आवाज लगाई ! 'उ ' मा 'अरे नहीं !  हो नहीं ! तब से देवी ब्रह्मचारिणी के पूर्व जन्म का एक नाम उमा भी पड़  गया !  अथार्थ हो गया !

उसकी तपस्या से तीन लोक में हाहाकार मच गया ! और देवता ,ऋषि  , गण , मुनि , सभी नवरात्र में दुर्गा माता का यह दूसरा स्वरूप भक्तों को अनंत फल देने वाला है ! इसके उपासना उसे मनुष्य में त्याग तप पर वैराग्य सदाचार संयम की वृद्धि होती है ! जीवन में अनेक कठिनाइयों से या संघर्षों में भी उनका मन कार्य पथ से विचलित नहीं होता है !

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माता ब्रह्मचारिणी देवी की कृपा से सब जगह सिद्धि  और विजय की प्राप्ति होती है !  दुर्गा पूजा के दूसरे दिन इन्हीं स्वरुप में उपासना की जाती है ! इस दिन साधक के मन में ''स्वाधिष्ठान ''चक्र में स्थित होता है !  इस चक्कर में अवस्थित मन वाला योगी  भी  !  उनकी कृपा से  भक्ति को प्राप्त करता है !
आज इस दिन अथार्त नवरात्रा  का दूसरा दिन को माता को शक्कर का भोग लगाना चाहियें !



 ब्रह्मचारिणी माता का ध्यान निम्न मंत्रो का उचारण करके किया जाता है - 

वन्दे  वांछित  लाभाय चन्द्रा  र्घकृत  शेख  राम्।


जप माला कमण्डलु  धरा  ब्रह्मचारिणी   शुभाम्॥




गौरवर्णा स्वाधिष्ठान स्थिता द्वितीय दुर्गा त्रिनेत्राम।


धवल  परि धाना ब्रह्मरूपा पुष्पा लंकार  भूषिताम्॥




परम    वंदना   पल्लव     राधरां     कांत    कपोला    पीन।


पयोध राम् कमनीया लावणयं स्मेर मुखी निम्न नाभि नितम्ब नीम्॥




 ब्रह्मचारिणी माता का पाठ स्तोत्र निम्न मंत्रो का उचारण करके किया जाता है - 

तपश्चारिणी  त्वंहि ताप  त्रय  निवारणीम्।

ब्रह्म रूपधरा  ब्रह्मचारिणी प्रण माम्यहम्॥


शंकर प्रिया त्वंहि  भुक्ति - मुक्ति  दायिनी।

शान्तिदा ज्ञानदा ब्रह्मचारिणी  प्रणमाम्यहम्॥

 ब्रह्मचारिणी माता का कवच का मंत्र का उचारण -


त्रिपुरा में हृदयं पातु ललाटे पातु शंकर भामिनी।

अर्पण   सदापातु   नेत्रो ,   अर्धरी  च कपोलो॥


पंचदशी कण्ठे पातु मध्य देशे पातु महेश्वरी॥

षोडशी  सदा  पातु  नाभो  गृहो  च पादयो।


अंग  प्रत्यंग    सतत  पातु   ब्रह्मचारिणी।



एक बात और भी ध्यान में रखने की है जब कोई भी नव रात्रा के दिनों में व्रत - उपवास करते है ! तो उसको जरूर ही दुर्गा सप्त शती का पाठ करना चाहिए ऐसा करने से बाधाये भी दूर होती है ! अपने घर में सुख - शांति भी बनी रहती है और मनुष्य की मनो कामना भी पूरी होती है ! इस लिए यह सब जानकर जरुर ही दुर्गा सप्त शती का पाठ अवश्य ही करना चाहिए !



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