नव रात्रा का पहला दिन शैल पुत्री - sharmaplus

Breaking

is web site se pandito ke karyo aur dharmik karyo ki puri jankari hindi me milti hai.

Featured Post

नव रात्रा का पहला दिन शैल पुत्री

                                 
                                        नव रात्रा का पहला दिन शैल पुत्री

                                          प्रथम दुर्गा  श्री  शैल पुत्री              

NAV RATRA KA PAHALA DIN SHREE SAIL PUTRI DEVI



नव रात्रा में पहले दिन दुर्गा माता अपने पहले स्व रूप में शैल पुत्री के नाम से जाना जाता है ! पर्वत राज हिमालय के रूप में वहाँ एक पुत्री के रूप में जन्म लिया था ! इस करण इसे शैल पुत्री भी कहते है ! नव रात्रा के पहले दिन इस शैल पुत्री की ही पूजा आराधना की जाती है ! और इसकी पूजा और आराधना करने से मनुष्य की सब मनो कामनाए पूरी हो जाती है !

माता शैल पुत्री का वाहन वृषभ है !  इस माता के दाहिने हाथ में त्रिशूल है ! और बाएं हाथ में कमल का पुष्प है ! यह माता बड़ी ही शोभा देती है ! और यह शैल पुत्री ही नव दुर्गा का पहला स्व रूप है ! अथार्त प्रथम दुर्गा है ! यह माता अपने पूर्व जन्म में प्रजापति दक्षक की कन्या के रूप में पैदा हुई थी ! तब इस माता का नाम 'सती' था !



यह भी पढ़े -

रामायण पाठ सामग्री सूची

फेरे के लिए सामग्री सूची

सत्य नारायण व्रत उद्द्यापन सामग्री सूची

आरती जय जगदीश हरे


इसका विवाह भगवान शिव शंकर से हुआ था ! एक बार एक समय की बात है की एक बार प्रजापति दक्षक ने बहुत बड़ा यज्ञ किया था ! इस यज्ञ में सभी देवताओ को यज्ञ में अपना - अपना यज्ञ भाग प्राप्ति करने के लिए निमत्रंण किया था ! परन्तु भगवान शिव शंकर को निमत्रंण नहीं किया था !

जब सती ने यह समाचार सुना की हमारे पिता प्रजापति दक्षक एक विशाल यज्ञ का अनुष्ठान कर रहे है ! तब सती का मन अपने पिता के वहां जाने को करने लगा ! और वह सती के रूप में माता अपनी इच्छा को भगवान शिव शंकर को बताई ! फिर सती ने सारी बातों का सोच - विचार करने के बाद वह बोली - हमारे पिता प्रजापति दक्षक किस कारण से हमसे नाराज हुए है !



और उन्होंने अपने विशाल यज्ञ में सभी देवताओ को आमंत्रण दिया है ! और उनके यज्ञ भाग को उनको समर्पित किये है ! और सती कहती है ! परन्तु हमें तो जान बुझ ही नहीं बुलाया है ! और हमें तो कोई सुचना तक ही नहीं दी है ! ऐ सी  प्रस्थिति में हमारा वहाँ जाना किस प्रकार से श्रेय स्कार नहीं होगा और शंकर भगवान ने इस उपदेश से सती का प्रबोध नहीं हुआ !

और सती के रूप में माता का अपने पिता प्रजापति दक्षक का यज्ञ देखने और वहाँ जाकर अपने माता और बहनों से मिलने की उसकी इच्छा किसी भी प्रकार से कम नही हो सकी और उसका प्रबल आग्रह को देखकर भगवान शिव शंकर ने वहाँ जाने की अनुमति दे दी ! और वह सती अपने पिता प्रजापति दक्षक के घर गई !

यह भी पढ़े -

नव रात्रा कैसे करते है

अथ श्री मणि कथा

बिंदायक जी की कहानी

वेदी कैसे बनाये


जब वह सती अपने पिता के घर गई तो वहाँ कोई भी उसका आदर व सत्कार नहीं किया ! और न की कोई उसके साथ प्रेम से बातचीत करता है ! जिधर वह जाती उधर ही सब लोग अपना - अपना मुँह दूसरी तरफ फेर लेते है ! और वहाँ उपस्थित में से केवल उसकी माँ ने ही उसे गले लगाया ! और बहनों की बातों में व्यंग और उपहार के भाव भरे थे !

उसके परिजनों के इस व्यवहार से उसको बहुत कलेश पहुँचा ! उन्होंने यह भी देखा की वहाँ चतुर्दिक भगवान शिव शंकर के प्रति तिस्कार के भाव से भरा हुआ है ! और उसके पिता प्रजापति दक्ष ने भगवान शिव शंकर के प्रति अपमान होने वाले शब्द भी कहें ! यह सब कुछ देखती हुई सती का दय क्षोभ , ग्लानी और क्रोध से सन्त पत हो गई ! और सती जी ने सोचा की भगवान शिव शंकर की बात ना मान कर यह तो सबसे बड़ी गलती कर ली हूँ !

वह सती अपने पति भगवान शिव शंकर के इस अपमान को न सह सकी सती ने तुरंत ही अपने इसी रूप में योगाग्नि द्वारा जल कर भस्म कर लिया ! और वज्रपात के समान इस इस दारुण दुःख की घटना को सुनकर भगवान शिव शंकर भी क्रोधित हो गए ! और अपने गणओं को भेजकर उस यज्ञ को पूर्ण रूप से विधवंस करवा दिया !

सती जी ने योगगिर द्वार अपने शरीर को भस्म करके अगले जन्म में शैल राजा हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया ! इस बार वह शैल पुत्री के रूप में विख्यात हुई है ! पार्वती , हेमावती भी उन्ही के ही नाम है ! उपनिषद की एक कथा के अनुसार यही हेमवती के रूप से देवताओ का गर्व - भजन किया था !

शैल पुत्री देवी का विवाह भी भगवान शिव शंकर के साथ हुआ था ! यह शैल पुत्री अपने पूर्व जन्म के भांति इस जन्म में भी भगवान शिव शंकर को ही पाया ! नव दुर्गाओं में प्रथम दुर्गा शैल पुत्री का महत्व और शक्तियाँ अनंत है ! नव रात्रा के पूजन में पहले दिन इसी माता की पूजा उपासना की जाती है ! इस प्रथम दिन नव रात्रा में उपासनाओं में योगी अपने मन को  ' मूला धार ' चक्र में स्थित करते है ! यहीं से उसकी योग साधना का प्रारम्भ होता है !

नव रात्रा के प्रथम दिन इस शैल - पुत्री माता  को घी का भोग लगाये ! 

यह भी पढ़े -

वृहस्पति वार व्रत कथा

वृहस्पति देव की कहानी

चरु कैसे बनाते है  

शैल पुत्री माता का ध्यान निम्न मंत्रो का उचारण करके किया जाता है - 


वन्दे वांछित लाभाय चन्द्रर्धकृत शेख राम् i

वृशा रूढ़ा शूल धरां शैल पुत्री यश स्वनीम् ii


पूणेन्दु निभां गौरी मूला धार स्थितां प्रथम दुर्गा त्रिने त्राम् i

पटाम्बर  परि धानां रत्ना  किरीटा   नामा लंकार भूषिता ii


प्रफुल्ल वंदना पल्ल वाधरां कातं कपोलां  तुग कुचाम् i 

कमनीयां लावण्यां स्नेमुखी क्षीण मध्यां नितम्ब नीम् ii


शैल पुत्री माता का पाठ स्तोत्र निम्न मंत्रो का उचारण करके किया जाता है - 


प्रथम दुर्गा त्वंहि    भवसागर:  तारणीम् i

धन ऐश्वर्य दायिनी शैल पुत्री प्रणमाभ्यम् ii


त्रिलो    जननी त्वंहि   परमानंद प्रदी यमान् i

सौभाग्य रोग्य दायनी शैल पुत्री प्रण माभ्यहम् ii


चरा चरेश्वरी त्वंहि  महा   मोह: विनाशिन i

मुक्ति भुक्ति दायनीं शैल पुत्री प्रमनाम्यहम् ii


शैल पुत्री माता का कवच का मंत्र का उचारण -


ओम कार: मेंशिर: पातु मूला धार निवासिनी i

हींकार:  पातु ललाटे   बीज   रूपा महेश्वरी ii


श्रीं  कारपातु  वदने  लावाण्या  महेश्वरी i

हुंकार पातु हदयं तारिणी शक्ति स्व घृत ii


फट्कार पात सर्वागे सर्व सिद्धि फल प्रदा ii


एक बात और भी ध्यान में रखने की है जब कोई भी नव रात्रा के दिनों में व्रत - उपवास करते है ! तो उसको जरूर ही दुर्गा सप्त शती का पाठ करना चाहिए ऐसा करने से बाधाये भी दूर होती है ! अपने घर में सुख - शांति भी बनी रहती है और मनुष्य की मनो कामना भी पूरी होती है ! इस लिए यह सब जानकर जरुर ही दुर्गा सप्त शती का पाठ अवश्य ही करना चाहिए !

आगे अब आपकी बारी यह है की यह पोस्ट आपको कैसी लगी आशा करता हूँ की जरूर ही आपको यह पोस्ट पसंद आई होंगी और अपने दोस्तों के साथ यह पोस्ट शेयर करे व आपके मन में कोई सवाल आता है तो या हम से कुछ कमी लगे तो हमें कोमेंट भी करे !