नव रात्रा का सातवें दिन काल रात्री - sharmaplus

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नव रात्रा का सातवें दिन काल रात्री



                        
               नव रात्रा का सातवें दिन काल रात्री



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माता काल रात्री का मंत्र -

 या  देवी  सर्व  भू‍तेषु  माँ  काल रात्रि  रूपेण संस्थिता ।

नमस्तस्यै      नमस्तस्यै   नमस्तस्यै   नमो   नम: ।।

एक  वेधी   जपा   कर्ण  पूरा  नग्ना   खरा   स्थिता ।

लम्बोष्ठी    कर्णिका   कणी   तैलाभ्यक्त    शरीरिणी ।।


वाम  पदोल्ल    सल्लोह    लता    कण्टक    भूषणा ।

वर्ध  नमू   र्धध्वजा    कृष्णा   काल   रात्रि  र्भयंकरी ।।




नवरात्रा में माता की पूजा व्रत - उपासना का बहुत ही महत्व होता है ! सातवे दिन माता दुर्गा का जो स्वरूप है ! वह कालरात्रि के नाम से जाना जाता है !  इस माता का शरीर का रण घने अंधकार की भाति  एकदम काला होता है ! इस माता के स्वरुप में सिर के बाल बिखरे हुए हैं ! गले में विधुत  की तरह चमकने वाली माला है !  इसे कालरात्रि माता के तीन नेत्र है !  यह तीन नेत्र ब्रह्मांड के सद्द्श गोल है !

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  इस माता की  विधुत  के समान चमकीले किरणों से नि : शर्त  होती रहती है !  इनकी नासिका के स्वास प्रश्वास से अग्नि की ज्वालाएं निकलती रहती हैं !  इस माता का वाहन गर्दभ - गधा  होता है !  इस  माता के  ऊपर उठे हुए दहिने  हाथ की वर  मुद्रा में सभी को वर  प्रदान करती है ! दहिने तरफ  नीचे वाला हाथ अभय मुद्रा में है !  बाईं तरफ माता के ऊपर के हाथ लोहे का कांटा है !  और बाईं तरफ माता के नीचे का हाथ में कटार है !

माता कालरात्रि के इस  स्वरुप को देखने में अत्यंत भयानक लगता है ! उसके बाद भी माता तो सदेव शुभ फल देने वाली होती है ! इस कारण से इस माता का नाम शुभ कार्य के नाम से जानी जाती है ! अतः माता के भक्ति इससे नए डरी और यह नहीं आतंककारी है !  इसके इसलिए माता से नहीं डरे !

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दुर्गा की पूजा के साथ ही दिन माता कालरात्रि की उपासना करने का विधान है !  इस दिन साधक  का मन "सहस्त्रार" चक्र  स्थित रहता है ! इस कारण से ब्रह्मांड की समस्त सिद्धियां प्राप्त होने लगती हैं !  इस सहस्त्रार चक्कर में साधक का मन पूर्ण रुप से माता कालरात्रि के स्वरुप में अवस्थित रहता है !  माता के साक्षात्कार में मिलने वाला पुण्य का वह साधक भागी हो जाता है !

माता कालरात्रि की कृपा से साधक के समस्त पापों का नाश हो जाता है !  और इससे अक्षय पुण्य - लोकों की प्राप्ति होती है ! माता कालरात्रि दुष्टों का विनाश करने वाली माता है ! माता के नाम का स्मरण करने से ही अनेक दानव , दत्य, राक्षस ,भूत, प्रेत, आदि का नाश हो जाता है ! इस पर माता की उपासना से ग्रह बाधाएं ही दूर होती हैं  !

इस माता के उपासकों को अग्नि भय , जल भय , जंतु भय , रात्री भय , शत्रु भय , आदि माता की कृपा से स्वत : ही दूर  हो जाते हैं ! और माता की कृपा से वह सर्वथा भय  से मुक्त हो जाता है ! माता की उपासना कैसे करें भक्तों को उसके लिए  माता कालरात्रि के स्वरूप को अपने हृदय  में अवस्थित करके मनुष्य को एक निष्ठा भाव से माता की उपासना करनी चाहिए !  माता के भक्त  को यम ,नियम ,संयम ,का पूर्ण रुप से पालन करना चाहिए !मन , वचन , काया , को साधक पवित्र रखनी  चाहिए ! यह  माता कालरात्रि देवी है !





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 माता कालरात्रि देवी के साधकों के सभी शुभ कार्यों की गणना की जा सकती है  ! अथार्त माता अत्यंत शुभ फल दायनी है ! हमें निरंतर माता का स्मरण करते रहना चाहिए और  ध्यान करना व  पूजा करते रहना  चाहिए !

नवरात्रि के सातवें दिन को माता को गुड़ का भोग लगाना चाहिए !


माता काल रात्री का ध्यान निम्न मंत्रो का उचारण करके किया जाता है - 


कराल   वंदना     धोरां   मुक्त   केशी      चतुर्भुजाम् ।

काल  रात्रिं करालिंका दिव्यां विद्युत  माला    विभूषिताम ॥


दिव्यं   लौह  वज्र   खड्ग  वामो   घोर्ध्व   कराम्बुजाम् ।

अभयं   वरदां    चैव  दक्षिणोध्वाघः  पार्णि  काम्  मम ॥


महा  मेघ   प्रभां   श्यामां   तक्षा   चैव   गर्द  भारूढ़ा ।

घोर  दंश  कारा  लास्यां    पीनोन्नत   पयो    धराम् ॥


सुख   पप्रसन्न     वदना      स्मेरान्न     सरोरूहाम् ।

एवं   सचियन्त   येत्  काल  रात्रिं सर्वकाम् समृध्दिदाम् ॥




माता काल रात्री का पाठ स्तोत्र निम्न मंत्रो का उचारण करके किया जाता है - 


हीं  काल रात्रि  श्री   कराली   च  क्लीं  कल्याणी  कलावती ।

काल   माता     कलि    दर्पध्नी   कमदीश    कुपान्विता ॥


काम     बीजज   पान्दा      कम     बीज   स्वरूपिणी ।

कुमतिघ्नी     कुलीन   र्तिनाशिनी    कुल   का    मिनी ॥


क्लीं    हीं   श्रीं   मन्त्र्वर्णेन   काल    कण्टक   घातिनी ।

कृपा   मयी   कृपा  धारा  कृपा    पारा      कृपा  गमा ॥


माता  काल रात्री  का कवच का मंत्र का उचारण -



ऊँ   क्लीं    मे   हृदयं   पातु   पादौ श्री  काल  रात्रि ।

ललाटे     सततं     पातु   तुष्ट   ग्रह     निवारिणी ॥ 


रसनां    पातु     कौमारी,       भैरवी     चक्षुषो    र्भम ।

कटौ     पृष्ठे    महे   शानी,    कर्णो  शंकर   भामिनी ॥


वर्जि   तानी   तु  स्था  नाभि   यानि  च  कवचेन  हि ।

तानि   सर्वाणि   मे    देवी  सततं   पातु   स्तम्भिनी ॥



एक बात और भी ध्यान में रखने की है जब कोई भी नव रात्रा के दिनों में व्रत - उपवास करते है ! तो उसको जरूर ही दुर्गा सप्त शती का पाठ करना चाहिए ऐसा करने से बाधाये भी दूर होती है ! अपने घर में सुख - शांति भी बनी रहती है और मनुष्य की मनो कामना भी पूरी होती है ! इस लिए यह सब जानकर जरुर ही दुर्गा सप्त शती का पाठ अवश्य ही करना चाहिए !


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