सोलह सोमवार व्रत कथा - sharmaplus

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सोलह सोमवार व्रत कथा

                                  सोलह सोमवार व्रत कथा

आज की पोस्ट सोलह सोमवार व्रत कथा  की है ! जो कोई सोलह सोमवार व्रत करता है उसके लिए KATHA निचे लिखी हुई है ! इस पोस्ट के माध्यम से यह कथा पढ़ सकते है !


SHARMAPLUS SOLH SOMWAR VART KATHA




                                             सोलह सोमवार व्रत कथा

एक बार एक समय मृत्यु लोक में  भ्रमण  करने की इच्छा करके भोले नाथ  माता पार्वती के साथ मृत्यु लोक में आए ! वे भ्रमण करते -करते  दोनों विदर्भ देशांतर्गत अमरावती नाम की अति रमणीक नगरी में पहुंचे !
अमरावती नगरी अमरपुरी के  सब प्रकार के सुख से परिपूर्ण थे !  उसमें वहां के महाराजा द्वारा बनवाया हुआ अति रमणीय शिव जी का मंदिर भी था ! भगवान शंकर तथा भगवती पार्वती उस मंदिर में रहने लगे अथार्थ उस मंदिर में निवास करने लगे !

एक समय माता पार्वती भगवान भोलेनाथ को प्रसन्न देख मनोविनोद करने की इच्छा से बोली है !' हे -महाराज आज तो हम दोनों  चौसर खेलेंगे ! ' शिवजी ने प्राण प्रिया की बातों को मान लिया और चौसर खेलने लगे ! उसी समय मंदिर का पुजारी ब्राह्मण मंदिर में पूजा करने आया !  माता पार्वती ने पुजारी से प्रश्न किया पुजारी जी बताओ इस बाजी में हम में से किसकी जीत होगी !  वह ब्राह्मण बिना विचारे शीघ्रता से बोल उठा कि महादेव जी की जीत होगी !

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थोड़ी देर बाद बाजी समाप्त हो गई और पार्वती जी की विजय हुई ! पार्वती जी बहुत क्रोधित हुई और ब्राह्मण को झूठ बोलने के अपराध में उसे श्राप देने को उद्यत हुई ! भोलेनाथ ने माता पार्वती को बहुत समझाया परंतु उन्होंने ब्राह्मणों को कोढ़ी होने का श्राप दे ही दिया !


कुछ समय बाद पार्वती जी के श्राप वश  पुजारी के शरीर में कोढ़  पैदा हो गया ! वह अनेक प्रकार से दुखी रहने लगा !  पुजारी को श्राप कष्ट भोंगते हुए जब बहुत दिन हो गए !  तब तक एक दिन देव लोक की अप्सरा शिवजी की पूजा हेतु उसी मंदिर में पधारी ! पुजारी के कोढ़ के कष्ट को उसने बड़े दया भाव से उससे रोगी होने का कारण पूछा !  पुजारी ने नि:संकोच सारी बात उन्हें बता दी !  वे  अप्सराएं बोली हे - पुजारी अब तुम अधिक दुखी मत होना ! भगवान शिव तुम्हारे कष्ट को दूर करेंगे ! तुम सब व्रतों में श्रेष्ठ षोडश सोमवार का वरत भक्ति भाव से किया करो !

पुजारी ने अप्सरा से विनम्र भाव से सोलह सोमवार व्रत की विधि पूछी !  अप्सरा ने बताया सोमवार को भक्ति  के साथ व्रत करे ! स्वच्छ वस्त्र पहने !  संध्या व उपासना के बाद आधा सेर गेहूं का आटा ले !  उसके तीन अंग बनाए !  और घी, गुड़,  दीप, नैवेध,  बेलपत्र, जनेऊ, जोड़ा, चंदन, अक्षत, पुष्प ,आदि के द्वारा प्रदोष काल में भगवान शंकर का विधि से पूजन करें ! तत्पश्चात तीनों में बांट दें !  और आप भी प्रसाद पाएं ! इस विधि से सोलह  सोमवार व्रत करें !  सतरहवें सोमवार को पाव - शेर पवित्र गेहूं के आटे की बाटी बनाएं ! उसमें घी और गुड़ मिलाकर चूरमा बनाएं !

भगवान भोलेनाथ को भोग लगाकर उपस्थित भक्तों में बांटे ! इसके बाद कुटुम्ब सहित प्रसाद ले ! तो शिव जी की कृपा से उसके सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं !ऐसा कह कर अप्सराये स्वर्ग को चली गई ! ब्राह्मण ने यथाविधि सोलह  सोमवार व्रत किया ! तथा  भगवान शिव की कृपा से रोग मुक्त होकर आनंद से रहने लगा !

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                   कुछ दिन बाद शिवजी और पार्वती फिर उस मंदिर में पधारे !  ब्राह्मण को निरोगी देख पार्वती जी ने ब्राह्मण से रोक मुक्त होने का उपाय पूछा !  तो ब्राह्मण ने सोलह सोमवार व्रत की कथा सुनाई !  पार्वती अति प्रसन्न हो ब्राह्मण से व्रत की विधि पूछकर स्वयं व्रत  करने को तैयार हो गई ! व्रत करने के बाद उनकी मनोकामना पूर्ण हो गई !  तथा उनके रूठे पुत्र स्वामी कार्तिकेय स्वयं माता के आज्ञाकारी हो गया ! कार्तिकेय जी को अपना यह विचार परिवर्तन का रहस्य जानने की इच्छा हुई !  माता के बोले हे - माता आपने ऐसा कौन सा उपाय किया जिससे मेरा मन आपकी ओर आकर्षित हुआ !

पार्वती जी ने वही सोलह सोमवार व्रत की कथा उनको सुनाई ! कार्तिकेय जी ने कहा - इस व्रत  को मैं भी कर लूंगा !  क्योंकि मेरे प्रिय मित्र ब्राह्मण बहुत दुखी दिल से प्रदेश गया है ! हमें उससे मिलने की बहुत इच्छा है !कार्तिकेय जी ने इस व्रत को किया और उसका प्रिय मित्र मिल गया !  मित्र ने इस आकस्मिक मिलन का भेद कार्तिकेय जी से पूछा ! तो कार्तिकेय जी  बोले हे - मित्र हमने तुम्हारे मिलने की इच्छा करके सोलह सोमवार का व्रत किया था !

अब तो ब्राह्मण मित्र को अपने विवाह की बड़ी इच्छा हुई ! उसने कार्तिकेय जी के व्रत की विधि पूछी तो पूछी !  और यथाविधि व्रत किया व्रत  के प्रभाव से जब वह किसी कार्यवश विदेश गया !  तो वहां के राजा अपनी  लड़की का स्वयं वर  कर था ! राजा ने प्रण किया था कि जिस व्यक्ति के गले में सभी प्रकार श्रृंगारित हथिनी माला डालेगी मैं उसी के साथ प्यारी पुत्री का विवाह कर दूंगा !  शिव जी की कृपा से वह ब्राह्मण भी स्वयं वर देखने की इच्छा से राजसभा में एक और बैठ गया ! सही समय पर हथिनी  आई और उसने जयमाला उस ब्राह्मण के  गले में डाल दी ! राजा ने प्रतिज्ञा के अनुसार धूमधाम से अपनी कन्या का विवाह किया और सम्मान देकर संतुष्ट किया ! ब्राह्मण सुंदर राज कन्या पाकर सुख से जीवन व्यतीत करने लगा !

एक  दिन राजा की कन्या ने अपने पति से प्रसन्न किया ! हे - प्राणनाथ आपने ऐसा कौन सा भारी पुणे किया है ! इसके प्रभाव से हाथिनि  ने अन्य राजकुमारों को छोड़कर आपको वरण किया !  ब्राह्मण बोला से प्राण प्रिया मैंने अपने मित्र कार्तिकेय जी के कथनानुसार सोलह सोमवार व्रत किया था ! जिसके प्रभाव से मुझे तुम जैसे रूपवान पत्नी की प्राप्ति हुई है !  व्रत की महिमा सुनकर राजकन्या को आश्चर्य हुआ ! वह भी पुत्र  की  कामना कर के व्रत करने लगी ! शिव जी की दया से उसके गर्भ में एक अत्यंत सुंदर, सुशील,धर्मात्मा, और विद्वान, पुत्र  उत्पन्न हुआ !

माता-पिता दोनों उस देवपुत्र को पाकर अति प्रसन्न रहने लगे !  उसका लालन-पालन भी भली प्रकार से करने !  लगे जब पुत्र  समझदार हुआ तो वह एक दिन उसने अपनी माता से प्रसन्न किया है !  माता तुमने कौन सा व्रत एवं तप  किया है ! जो मेरे जैसा पुत्र  तुम्हारे  गर्भ  से उत्पन्न हुआ है ! माता ने सोलह  सोमवार व्रत की विधि पुत्र  को बताई  पुत्र  ने सब तरह  के मनोरथ पूर्ण करने वाले सरल व्रत  को सुना ! तो वह राज अधिकार पाने की इच्छा से हर सोमवार को यथाविधि से यह व्रत करने लगा !

व्रत शुरू होने के बाद एक ही देश के राजा के दूतों  ने आकर उसको राज कन्या  के लिए वरण किया ! राजा ने अपनी पुत्री का विवाह है ऐसे सर्वगुण संपन्न ब्राह्मण के साथ  करके बहुत बड़ा सुख प्राप्त किया ! राजा ने अपनी पत्नी को राजमहल से निकाल दिया रानी दुखी ह्रदय से भाग्य को कोसते हुए नगर के बाहर चली गई  ! बिना पद प्राण के फट्टे वस्त्र पहने भूख  से दुखी  धीरे-धीरे चल रही थी !  वह एक ग्राम में पहुंची वहां एक बुढीया सूटी  काट कर बेचने जाती थी ! रानी की करुण दशा को देखकर बोली चल तो मेरा सूत बिकवा दे !

इसके बाद रानी एक तेली के घर गई ! शिवजी के प्रकोप के कारण तेली के सब मटकी उसी क्षण चटक गए थे !  तेली  भी रानी को अपने घर से निकाल दिया !  अत्यंत दुखी पाते हुए रानी एक दिन नदी के तट पर गई तो नदी का समस्त जल सुख गया !  तत्पश्चात रानी एक वन गई ! वहां जाकर सरोवर  में सीढ़ी से उतर कर पानी पीने गई ! उसका हाथ का स्पर्श करते ही सरवर का नीलकमल के समान जल में  असंख्या कीड़े  में होकर गंदा हो गया !  रानी ने अपने भाग्य पर  आरोप करते हुए उस जल को पीकर पेड़ की शीतल छाया में विश्राम करना !  चाहा परंतु जिस पेड़ के नीचे जाते उस पेड़ के पत्ते तत्काल गिर जाते !

वन सरोवर जल की ऐसी दशा देख ! गौ चराते ग्वालों ने अपने गुसाई जी से जो उस जंगल में स्थित मंदिर के पुजारी थे यह बात बताई ! गुसाई जी के आदेशानुसार रानी को पकड़कर गुसाई जी के पास लाए ! रानी की मुख्य कांति और शरीर शोभा देख गुसाई जी जान गए !  कि यह अवश्य ही कोई विधि  की गति की मारी कुलीन स्त्री है !  पुजारी ने रानी से कहा कि - पुत्री !  मैं तुमको अपनी पुत्री के समान रखूंगा !  तुम मेरे आश्रम में ही रहो मैं तुमको किसी प्रकार का कष्ट नहीं होने दूंगा !  गुसाई जी के वचन सुनकर रानी को धीरज हुआ !  आश्रम में रहने लगी !
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रानी जो भोजन बनाती उस में कीड़े पड़ जाते ! जल भर कर लाती उसमें भी कीड़े पड़ जाते ! रानी की यह दशा दे गुसाई जी भी बहुत दुखी हुए !  और रानी से बोले ! हे - बेटी तुम्हारे ऊपर कौन से देव का प्रकोप है !  जिससे तुम्हारी ऐसी दशा है !  पुजारी की बात सुनकर रानी ने शिव जी महाराज के पूजन का बहिष्कार करने की बात बताई !  तो पुजारी शिव जी महाराज की अनेक प्रकार से स्तुति करते हुए रानी को बोले ! की पुत्री तुम सब मनोरथ पूर्ण करने वाले सोलह  सोमवार व्रत को करो !  उसके प्रभाव से अपने कष्टों से मुक्त हो सकोगी !



गुसाई जी की बात मानकर रानी ने सोलह सोमवार व्रत किए ! और सतरहवें सोमवार को विधि विधान सहित पूजन किया !  उस पूजन के प्रभाव से राजा के ह्रदय में विचार उत्पन्न हुआ की रानी को गए बहुत समय व्यतीत हो गया !  न जाने कहां कहां भटकती होगी उसे ढूंढना चाहिए !  यह सोच रानी की तलाश करने के लिए राजा ने चारों दिशाओं में दूत भेजे  हुए ! दूत रानी को ढूंढते हुए गुसाई के आश्रम में पहुंच गए !

वहां रानी को पाकर पुजारी से रानी को अपने हाथ ले जाने का आग्रह करने लगे ! परंतु पुजारी ने मना कर दिया ! दूत  चुपचाप वहां से  गए ! और महाराज को रानी का पता बताया ! रानी का पता पाकर राजा स्वयं पुजारी के आश्रम में गए ! और पुजारी से प्रार्थना करने लगे महाराज जो देवी आप के आश्रम में रहती है वह मेरी पत्नी है ! शिवजी के प्रकोप  से मैंने उनको त्याग दिया  था ! अब  इस पर शिवजी का प्रकोप शांत हुआ है ! इसलिए मैंने लेने आया हूं ! आप इनको मेरे साथ जाने की आज्ञा दीजिए !

गुसाई जी ने राजा के वचन को सत्य समझकर रानी को राजा के साथ जाने की आज्ञा दे दी !  गुसाई जी की आज्ञा पाकर रानी पसंद हो कर राजा की साथ ही नगर में आई ! नगर निवासियों ने नगर के द्वार पर तथा नगर को तोरण  एवं बंदरवालों से विविध  विधि से सजाया ! घर घर में मंगल गान होने लगे !  पंडितों ने भी विविध  वेद मंत्रों का उच्चारण कर अपनी राज रानी का स्वागत किया !  ऐसी अवस्था में रानी ने पुन : अपनी राजधानी में प्रवेश किया ! महाराज ने ब्राह्मणों को अनेक तरह के दानादि  दे  कर संतुष्ट किया ! याचको को धन धन्य दिया !   नगरी  में स्थान - स्थान पर सदा व्रत खुलवाये,  जहां भूखे  लोगों को भोजन मिलता था !

इस प्रकार से राजा शिव जी की कृपा का पात्र हो राजधानी में रानी के साथ अनेक तरह के सुखों को भोग  करता सोमवार का व्रत करने लगा ! विधिवत शिव पूजन करते हुए !  इस लोक में अनेक सुखों को भोगने के पश्चात दोनों शिवपुरी को पधारें ! जो मनुष्य मनसा -वाचा -कर्मणा- भक्ति सहित सोलह  सोमवार का व्रत एवं पूजन इत्यादि विधिवत करता है ! वह इस लोक में समस्त सुखों को भोग कर अंत में शिव धाम को प्राप्त होता है ! यह व्रत सब मनोरथों को पूर्ण करने वाला है !

                                                     !! कथा समाप्त !!

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