वृहस्पति वार व्रत कथा - sharmaplus

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वृहस्पति वार व्रत कथा

                     वृहस्पति वार व्रत कथा
                                                              कथा 

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एक बार पुराने समय की बात है ! भारत में एक राजा राज्य करता था ! और वह राजा बड़ा ही प्रतापी और दान देने में श्रेष्ट था ! वह रोजाना सुबह उठ कर स्नान आदि नित्य कार्य करके रोजाना मंदिर में दर्शन करने के लिए  जाता था ! और साथ ही वह राजा ब्रहामण व अपने गुरु की सेवा करता था ! और उसके दरवाजे पर आया हुआ कोई भी निराश होकर नहीं लोटता था ! और राजा सप्ताह में हर गुरुवार के दिन व्रत करता था ! और पूजा भी करता था ! राजा हर दिन गरीब लोगों की सहायता करता था परन्तु उसकी रानी को राजा का ऐसा काम अच्छा नहीं लगता था ! वह रानी ना तो कभी व्रत किया करती थी ! और ना ही कभी किसी को  दान देती थी ! और राजा को भी व्रत , पूजन , दान आदि देने के लिए मना करती थी !

एक बार एक समय की बात है की राजा शिकार खेलने के लिए कही जंगल में गया हुआ था और घर पर उसकी रानी और दासी ही थी ! तो उसी समय वृहस्पति देव एक साधू का रूप धारण करके राजा के दरवाजे पर भीक्षा मांगने के लिए गए और  रानी से भिक्षा माँगा तो रानी कहने लगी की हे साधू  महाराज मै दान और पुण्य के काम से तंग आ गई हू और मेरे से तो घर का कार्य ही पूरा नहीं होता अर्थात मै यह कार्य कैसे कर सकती हू ! इस लिए यह कार्य मेरे पति देव या राजा ही बहुत है ! और आप मुझ पर ऐसी क्रपा करे की जिससे सारा धन नष्ट हो जाये तो मै आराम से रह सकती हूँ ! इस बात पर साधू बोले की आप बड़ी विचित्र लगती हो ! धन और संतान से कोई दुखी नहीं होता है ! यह तो सभी ही चाहते है ! की हमारे पास धन हो और हमें संतान मिले पापी मनुष्य भी यही चाहता है की हमें धन और संतान मिले तो आप ऐसा करो की भूखे मनुष्य को भोजन करवाओ और गरीबों को दान करो प्याऊ लगवाओ कुआ , बावड़ी तालाब बाग - बगीचा बनवाओं और निर्धन आदमी की सहायता करो तथा कुंवारी कन्याओं का विवाह करवाओ और धर्म के कार्य व यज्ञ करो ! यदि आप ऐसा करी हो तो परलोक में आपका नाम सार्थक रहेगा व आपको स्वर्ग की प्राप्ति भी होगी ! लेकिन रानी फिर भी खुश नहीं थी और साधू से बोली की हे - साधू हमें ऐसे धन की जरुरत नहीं है ! जो की किसी को दान करना पड़े तथा उसका रख - रखाव के लिए हमारा समय होता है !



इस बात पर साधू बोले की आपकी इच्छा ऐसी ही है तो आपको मै बताता हू आप वैसा ही करे !  वृहस्पति वार के दिन घर को गोबर से लीपना और अपने बालों को धोना , बालों को धोते समय ही स्नान करना और अपने राजा से भी कहना की वो हजामत करवाए भोजन में आप मांस - मंदिरा प्रयोग करना कपड़े धोने के लिए धोबी से कपड़े की धुलाई करवाना ऐसा आप सात वृहस्पति वार तक करते रहना फिर आपका सब धन - संपति नष्ट हो जायेगी ऐसा कहकर साधू वहाँ से अन्तर्धान हो गए !

फिर रानी ने जो साधू बताया था ! उसी के अनुसार ही कार्य किया और तीन सप्ताह तक वृहस्पति वार आया ऐसा ही किया फिर तीन सप्ताह तक ही उसका सब धन - संपति नष्ट हो गई ! और दिन में भोजन के लिए भी उसे तरसना पड़ा तथा संसारिक भोगों से दुखी रहने लगे ! फिर राजा में कहाँ की आप यही पर रहो और मै दूसरे देश में जाता हूँ ! क्योकि यहाँ मुझे सभी आदमी जानते है इस लिए मै यहाँ काम नहीं कर सकता हूँ देश में चोरी और परदेश में भीख दोनों बराबर होती है ! ऐसा कहकर राजा परदेश चला गया ! राजा परदेश में रहते हुए लकड़ी कटता था ! और उसको शहर में बेचता था इस प्रकार अपना गुजर करने लगा ! और रानी की तरफ तो रानी और दासी दोनों ही दुखी रहने लगी कभी तो उसे भोजन मिलता था ! तो भोजन कर लेती और कभी भोजन नहीं मिलता तो वे पानी ही पीकर दिन गुजर लेती थी ! एक बार रानी और दासी दोनों को  ही सप्ताह तक भूखे रहना पड़ा !

रानी अपनी दासी को कहती है की यहाँ पास के नगर में मेरी बहन रहती है वह बहुत ही धन वन है और आप उसके पास जाओ और पांच सेर बेझर मांग कर लाओ जिससे हमारा कुछ समय गुजर जायेगा ! दासी रानी की आज्ञा मानकर रानी की बहन के पास जाती है तो उस समय रानी की बहन  पूजन कर रही थी ! क्योकि उस दिन का वृहस्पतिवार था ! दासी ने रानी की बहन को देख तो कहा की हे रानी आपकी बहन ने हमें भेजा है ! आप सेर बेझर दे दो ! और दासी रानी की बहन को ऐसा बार -बार कह रही थी लेकिन रानी की बहन ने उसे बोला तक ही नहीं क्योकि वो वृहस्पतिवार की कथा सुन रही थी ! ऐसे दासी को कोई जबाब नहीं मिला रानी से तो वह दुखी हुई और उसे क्रोध भी आया !

और दासी खाली हाथ लोटकर अपने गाँव में रानी के पास आकार कहने लगी की हे - रानी आपकी बहन बहुत ही धनवान है ! वह तो छोटे लोगों से बात तक ही नहीं करती है ! मैने उसको बार - बार कहा परन्तु वो हमसे बोली ही नहीं और मै वापस आ गई ! रानी दासी से कहती है की मेरी बहन का कोई दोष नहीं है क्योकि जब किसी के बुरे दिन आते है तो उसका कोई भी साथ नहीं देता है ! अच्छे - बुरे का पता तो विपत्ति के समय ही लगता है ! और भगवान की जो इच्छा होगी वही होगा !

रानी कहने लगी की यह तो हमारे भाग्य का दोष है ! उधर से रानी की बहन ने देखा की मेरी बहन की दासी आई थी ! परन्तु मै उससे बोल ही नहीं सकी इसलिए वह बहुत दुखी हुई होगी ! ऐसा सोचकर वह कथा सुनकर भगवान विष्णु के पूजन के कार्य को पूरा करके अपनी बहन के घर चली गई और अपनी बहन से कहने लगी - मै वृहस्पतिवार का व्रत कर रही थी और आपकी दासी आई तब मै कथा सुन रही थी ! इसलिए मै ना तो उठी और ना ही उनसे बात कर सकी और दासी को बोली की बोलो आप हमारे पास क्या काम गई थी ! बहन आपसे कोई बात नहीं छुपा रही हूँ ! हमारे पास अनाज नहीं था ! इस कारण आपके पास मेरी दासी को आपसे पास  पांच सेर बेझर लेने के लिए भेजा था ! रानी की बहन रानी से बोली की वृहस्पति देव ही सबकी मनोकामनाए पूरी करने वाले देव है !
आप देखो शायद आपके घर में अनाज रक्खा होगा ! ऐसा सुना तो रानी तुरंत अपने घर के अंदर गई और देख एक बड़ा बेझर भरा हुआ है ! तब रानी और दासी बहुत ही दुखी हुई और दासी रानी  से कहती है  - हे रानी देखो हमको जब नहीं मिलता तो हम रोज ही व्रत की तरह भूखे रहना पड़ता था ! और आपकी बहन से व्रत की विधी पूछ ली जाये तो हम भी व्रत करेंगे ! तब रानी ने अपनी बहन से पूछा तो बहन ने बताया की वृहस्पतिवार के व्रत में चना की दाल , मुनक्का से विष्णु भगवान का केले की जड़ से पूजन करे और दीपक जलावे  पीला भोजन करे और बाद में कहानी को सुने ऐसा करने से भगवान प्रसन्न होते है ! और अन्न देते है धन देते है व पुत्र देते है और मनोकामनाये पूरी करते है ! तब रानी और दासी से निश्चय किया की वो वृहस्पति देव का पूजन जरुर ही करेंगे !

जब सप्ताह में वृहस्पतिवार आया तो वे दोनों रानी दासी ने व्रत रखा ! और घुड़ शाला में जाकर चना गुड़ बिन लाई तथा उसकी दल से केले की जड़ का तथा भगवान विष्णु का पूजन किया अब पीला भोजन की चिंता थी की  वो कहाँ से लाए ! लेकिन फिर भी उसने व्रत किया ! उस पर भगवान हुए और एक साधू का रूप धारण करके दो थालियों में सुन्दर पीला  भोजन लेकर आये और दासी को देकर बोले - यह भोजन आपके लिए और आपकी रानी के लिए है ! आप दोनों यह भोजन कर लेना तब दासी खुश हुई और रानी के पास जाकर रानी से बोली की भोजन कर लो रानी को इसके बारे में कुछ ही पता नहीं था और दासी से बोली - आप ही भोजन कर लो आप व्यर्थ में हंसी उड़ाती हो  तब दासी बोली यह भोजन तो साधू हमें देकर गया है इसलिए हम दोनों (मै और आप) साथ - साथ भोजन करेंगे ! बाद में रानी और दासी दोनों ने साथ - साथ पहले वृहस्पति देव को नमस्कार किया फिर  भोजन किया ! उसके बाद वे हर वृहस्पतिवार के दिन वृहस्पति देव का व्रत करने लगी और विष्णु भगवान का पूजन करने लगी ! वृहस्पति देव की क्रपा से रानी और दासी दोनों धनवान हो गई !

कुछ समय के बाद रानी फिर से पहले की तरह आलस्य करने लगी तो दासी बोली की आप पहले भी आलस्य करती थी ! तो धन रखने का कष्ट होता था इस कारण से धन नष्ट हो गया था ! अब वृहस्पति देव की क्रपा से धन मिलता है तो आप फिर से वही आलस्य कर रही हो ! यह धन तो बड़ी मुसीबत से मिलता है ! अब हम दान  पुण्य भी करेंगे भूखे को भोजन कराएगें और प्याऊ बनवाएगें ब्राहमण को दान करेगें  कुआ तालाब व बावड़ी और मंदिर एव पाठ शाला के लिए दान करेंगे कवांरी कन्याओ का विवाह करवायेगें धन को शुभ कार्यों में खर्च करो जिससे आपका यश बढ़ेगा तथा स्वर्ग की प्राप्ति होगी पित्र प्रसन्न होगें !

रानी को यह बात समझ में आई और ऐसा ही करना शुरू कर दिया और रानी का यश काफी फ़ैल गया और रानी और दासी यह विचार करने लगी की न जाने राजा किस दशा में है उसका कोई समाचार ही नहीं मिला तब रानी और दासी दोनों वृहस्पति देव से प्रार्थना करने लगी तब वृहस्पति  देव राजा को स्वप्न में कहा - आप उठो आपकी रानी आपको याद कर रही है ! और  आप अपने देश को जाओ राजा सुबह उठने के बाद ऐसा विचार किया की स्त्री तो पहनने और खाने के लिए ही होती है फिर भी भगवान की आज्ञा मानकर नगर को जाने के लिए तैयार हुआ इससे पहले वह परदेस में चला गया वहाँ लकड़ी बेचकर बड़ा दुःख पाता हुआ जीवन व्यतीत करता था ! और एक दिन दुखी होकर पुरानी बाते याद करने लगा !


तब जंगल में वृहस्पति  देव एक साधू का रूप धारण करके राजा के पास आकार बोला हे - लकडहारे आप इस जंगल में किस चिंता में बैठे हो ! मुझे बताओ तब राजा की आँखे पानी से भर गई राजा साधू से वंदना करके बोला - हे साधू आप सब कुछ जानने वाले हो ! यह कहकर राजा उस साधू को अपनी पूरी कहानी बता दिया !
वे साधू  राजा से बोले - हे राजा आपकी स्त्री ने वृहस्पति देव का अपराध किया था ! उस कारण आपकी यह दशा हुई है ! अब आप चिंता मत करो  भगवान आपको पहले से अधिक धन देगा ! और आपकी रानी वृहस्पति वार कर व्रत शुरू कर दिया है ! और आप मेरा कहना मानकर वृहस्पतिवार के दिन व्रत करके चने की दाल गुड़ जल लोटे में डालकर केला का पूजन करो और कथा कहो और सुनो भी वृहस्पति देव आपकी सारी मनोकामनाये पूरी करेंगे ! तब राजा बोला मुझे तो इतने पैसे ही नहीं मिलते है लकड़ी बेचने से भोजन करने के बाद कुछ पैसे बचा सकू ! राजा ने रात्रि स्वप्न में देखा की रानी व्याकुल है ! मेरे पास पैसे भी नहीं है ! उसकी खबर मगवाने के लिए !

 और राजा साधू से बोला की मै फिर कोनसी कहानी कहू मुझे तो कुछ नहीं पता तब साधू राजा से बोला - आप किसी बात की चिंता न करे ! आप तो वृहस्पतिवार के दिन रोजना की तरह लकड़ी लेकर शहर को जाओ और आपको अन्य दिनों की अपेक्षा दुगना धन मिलेगा ! जिससे आप दोनों समय का भोजन करके भी कुछ धन बचाओंगे जिससे वृहस्पति देव की पूजा का सामान भी ले आओगें !

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                                           !! समाप्त !!